Wednesday, 28 March 2018

क्राँति

वो नई नई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आई थी। सिंह द्वार को दखते ही नतमस्तक हो उठी थी। हाँ यह वही जगह है जहाँ चुन लिए जाने के सपने वो अपनी बारहवीं बोर्ड के परचे लिखते हुए बड़ी शिद्दत से देखती थी। जितना विशाल यह विश्वविद्यालय था उतने ही विशाल उसके ख्वाब थे। गर्व का भाव कूट कूट कर उसके अंदर भरा हुआ था और हो भी क्यों न, आख़िर पूरे देश मे अव्वल दर्जे से पास हो कर वह सर्वविद्या की राजधानी में आई थी।
पर आते ही उसने देखा, की उसकी आज़ादी, उसके सपने, और उसकी उड़ान शाम 8 बजे के बाद खत्म हो जाती थी। कम से कम उसकी सारी दोस्त तो कुछ ऐसा ही कहा करती थीं।
खैर, उसकी माँ ने उसे कान्हा जी की एक तस्वीर दी थी जिसे उसने अपने स्टडी टेबल की सामने वाले दीवार पर चिपका रखा था। एक दिन रात भारत के महापुरुषों पर एक किताब पढ़ते- पढ़ते उसकी नज़र कान्हा जी की तस्वीर पर गई और फर उस किताब पर। उसने किताब के पन्नो को सरसरी तौर पर पलटा और अचनाक ही उसके मन मे ये विचार कौंध पड़ा कि महात्मा गांधी से लेकर नेहरू, पटेल, गोखले, जेपी, मंडेला इत्यादि सब ने जेल में रह कर ही तो बदलाव और स्वाधीनता की पृष्ठभूमि तैयार की थी। कान्हा जी तो पैदा ही कारागार में हुए थे। उसके चेहरे पर एक हँसी थी और जीवन का एक बहुत अच्छा प्रोत्साहन उसे मिल चुका था।
खैर लंका उसके लिए लंका की तरह ही था जहाँ रावणों की कोई कमी नही थी। भगवा गमछा लपेट कर सब भिक्षुक के भेष में ही तो रहा करते थे। हालांकि उन भिक्षुओ के मुख से स्त्रियों के लिए भिक्षामि देहि की जगह "का चौचक माल बा यार" निकला करता था। उसे उन भिक्षुओं से बहुत डर लगता था इसीलिये वह अपनी रूममेट के साथ ही लंका जाया करती थी। उसकी रूममेट आधुनिक विचारों की एक सत्यमूर्ति थी। सच कहें तो वह उसे आदर्श मानने लग गयी थी।
फिर एक रात ऐसी आई जब वो, उसकी रूममेट और उनकी जैसी सैकड़ो लड़कियाँ उसी सिंह द्वार पर  लक्ष्मण रेखा बन कर बैठी हुई थीं ताकि कोई भी रावण अपनीं आंख भी न उठा सके। खैर रावण की आंख तो नही उठी लेकिन खाखी चोला पहने कुछ पचास साठ कुम्भकर्णो की लाठियां ज़रूर उठी थी।
लाठी का असर उसके और उसकी रूममेट पर बहुत गहरा पड़ा था। दोनों के मन मे क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी थी। उसने एक दिन अपनी रूममेट को लाल दुपट्टा गले मे गोल बांध कर जाते हुए देखा और सहसा पूछ उठी की कहा जा रही हो। उसने कहा कि सभी अत्याचार और अत्याचारियों को जड़ से उखाड़ने के लिए जिस क्रांति की आवश्यकता है मैं उन क्रांतिकारी लोगो का साथ देने जा रही हूँ, हमें सभी छात्रों के अधिकारों की रक्षा करनी है, तुम भी चलो। उसने मना कर दिया। उसे डर था कि पिछली बार लाठी हाथ पर पड़ी थी अगली बार कहीं सिर ही शिकार न बन जाये। लेकिन उसके भीतर की क्रांति उसे कचोट रही थी। तो उसने भी बदलाव का कदम उठा ही लिया। उसने ठान लिया कि सबसे पहले वो खुद को बदलेगी। खुद को सशक्त बनाएगी और फिर उसी राह पर चलते हुए समाज को सशक्त बनाएगी। उसके अंदर की दुर्गा ने अपना त्रिशूल चुन लिया था कलम के रूप में और धीरे धीरे उसने अज्ञानता के महिषासुर को मारना शुरू कर दिया।
तीन साल यूँ ही निकल गए। उसने CAPF की परीक्षा दी और उसमें भी चयनित हो गयी। स्नातक के तीन साल बाद वह CRPF में असिस्टेन्ट कमांडेंट बन चुकी थी। उसकी मेहनत और BHU के आशीर्वाद ने उसे जो गर्व की अनुभूति दी वो शायद अतुलनीय थी। उसकी पहली पोस्टिंग कश्मीर में हुई थी जहाँ उसका सामना लंका के सिगरेट अड्डों में बसने वाले वाले रावणों से भी खूंखार राक्षसों से हर दिन होता था।
उसने बहुत दिनों बाद फेसबुक खोला। ट्रेनिंग के समय वह चला नही पाती थी और कॉलेज के समय में तो ढोंगियों और स्त्री स्वाधीनता की निंदा करने वाले लोगो की पोस्ट्स से त्रस्त हो कर उसने फेसबुक से नफरत करना शुरू कर दिया था।
खैर उसने एफबी देख ही लिया। कुछ न्यूज़ फीड स्क्रॉल करने पर उसने देखा कि उसके कॉलेज टाइम का एक बदमाश जो अपने समय मे लंका की फब्तियाँ मार्किट का बेताज बादशाह हुआ करता था उसे पुलिस घसीट कर ले जा रही है। उसके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा हुँह, इनका कुछ नही हो सकता। उसने नोटिफिकेशन चेक किया। उसकी बीएचयू वाली रूममेट, जो कि अब जेएनयू वाली हो चुकी थी, उसका जन्मदिन था। रात का ही समय था, उसने उसे फोन लगाया। कुछ देर की घंटी के बाद उसने फोन उठाया तो उसकी आवाज़ के साथ साथ कई लोगो के नारे लगाने की आवाज़ें आ रही थी। उसने कहा हैप्पी बर्थडे.... क्या???.... अरे हैप्पी बर्थडे!!! नहीं समझ मे आया?? हैप्पी बर्थडे बोल रही हूं!!! बर्थडे विश का जवाब तो नहीं आया लेकिन एक आवाज़ ज़रूर आयी कि "भारत तेरे टुकड़े होंगें, इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह" भारत की बर्बादी....... कश्मीर की आज़ादी.... उसने फोन रख दिया आंखें मूंदी और सो गई। उसने सुबह की खबर देखी कि जेएनयू के छात्रों को लाठियों की सलामी मिली। उसने वर्दी पहनी और छावनी ग्राउंड पर पहुच गयी। बटालियन के साथ उसने तिरंगे को सलामी दी और बस यही कहा, लव यू इंडिया....
©अशुतोष तिवारी

Friday, 23 March 2018

ग़ज़ल

है आस कि मिले उनसे कोई इशारा देखते-देखते।
बाल पक चुके हैं मेरे यही नज़ारा देखते-देखते।

वे दौड़ने की उम्र में औंधे मुँह गिराते हैं,
फिर हैं देते बैसाखियों का सहारा देखते-देखते।

यहां हाथ की पतवार से कश्ती जो खींचोगे,
तब मिले है जाकर कोई किनारा देखते-देखते।

ज़मींदोज़ रहे हम औ' वो जन्नत को छू आये,
हँसी आती है उन्हें हाल हमारा देखते-देखते।

दलीलों के बोझ तले बस यह आस जिलाये है,
जवाब उन्हें भी मिले कोई करारा देखते-देखते

ग़ज़ल

इंसानियत की सर्दी भाँप सको तो कहो,
दीनों पर कंबल ढाँप सको तो कहो।

उड़ तो लेते हो तुम भी आसमां तलक़,
इश्क़ की गहराइयाँ नाप सको तो कहो।

दिली तकलीफें तो बयाँ रोज़ होती हैं
तकलीफें कभी मुल्क की छाप सको तो कहो।

निकालने में नुक़्स तुम तो अव्वल हो,
गिरेबाँ में अपने झांक सको तो कहो।

कितना रोकोगे हक़ीक़त देखने से मुझे,
हदें नज़राने की माप सको तो कहो।

ग़ज़ल

आज फिर मैं काफिरों में शामिल हो गया हूँ,
देख तुझको चाहने के काबिल हो गया हूँ।

तू है नदी अपनी राह में बहती चली
मैं खड़ा हूँ मूक तेरा साहिल हो गया हूँ।

अब तो ज़मीं पर पांव भी पड़ते नहीं मेरे,
उड़ते-उड़ते मैं तनिक हारिल हो गया हूँ।

मेरे ये जो लब्ज़ तुमको कर भी दें घायल,
लेना समझ की मैं थोड़ा कातिल हो गया हूँ।

दुनिया की भाषा मैं तो थोड़ी देर में समझूँ,
जान लो तुम भी की मैं जाहिल हो गया हूँ।

ग़ज़ल

तू मुझे मिले तो सारे कर्ज़ माफ हैं,
मुक़्क़दमें लगीं जो तुझपे दर्ज़ माफ हैं।
मुझ तक न आई अपनी कमियों को सोच तुम,
यहाँ काफिरों तक कि आदाब अर्ज़ माफ है।

ग़ज़ल

जिनपे ऐतबार कर हमारा ठगना हुआ है,
उनसे इंसानियत का मंत्र कभी जपना हुआ है?

यहाँ मतलब के बूते ही तो सब रिश्ते बनाते हैं,
माँ बाप को छोड़ क्या कोई अपना हुआ है?

लौट चलो बचपन में कि यहाँ सब ख्वाब झूठे हैं,
फूल-परियों से अच्छा क्या कोई सपना हुआ है?

तभी आते हो तुम जब तुमको आँसू दिखे हैं,
तुम्हारे भीतर का इंसाँ क्या कहीं दफ़ना हुआ है?

ये न सोचो कि चमकोगे निकलते ख़ाक से,
तुम्हारा सोने सा क्या कभी तपना हुआ है?

Wednesday, 21 March 2018

ग़ज़ल

अब वो दिल का माप करते हैं ज़रा बच के चलो।
लब्ज़-ए-झूठ जाप करते हैं ज़रा बच के चलो।

अपने तो लगा घात हमें डस भी लेते हैं
यहाँ हर ओर साँप रहते हैं ज़रा बच के चलो।

कानून का भी इल्म उन्हें हो गया है अब
फरमान-ए-मौत छाप सकते हैं ज़रा बच के चलो।

परियों को मारें कोख में औ' देवी को पूजे हैं
वो खुद को बाप कहते हैं ज़रा बच के चलो।

कभी मुल्क में भी रामराज था ये भूलो तुम
अब राजा भी पाप करते हैं ज़रा बच के चलो

ग़ज़ल

दुनिया में रह कर भी ओहदा अंजान का रखा है,
बुलन्द आवाज़ पर हर गरीब जवान का रखा है।

वे पूछे हैं कि कैसे कर आता है दान दीन,
उन्हें अंदाज़ा नहीं की खज़ाना मैंने ईमान का रखा है।

लोग कहते हैं कि न खा कर पैसे बचाता है कंजूस,
उन्हें कैसे कहूँ की रोज़ा मैंने रमज़ान का रखा है।

लगाना तो चाहें वो मेरी सारी ग़ज़लों पर ताला,
इल्म तो फिर भी मैने हर ज़ुबान का रखा है।

नापाक माने तो माने उनकी नज़रें हमें क्या,
नज़राना तो हमने भी एक नेक इंसान का रखा है।

मदीने से रूबरू होना मुश्किल तो है मग़र,
सीने में घरौंदा तो रहमान का रखा है।

©आशुतोष तिवारी