गाँधी, रामराज्य और स्त्री...
क्वारन्टीन में रहने से कई किताबों को पढ़ने और पूरा करने का मौका मिल रहा है। आज की किताब थी खुशवंत सिंह की, “व्हाई आई सपोर्टेड द इमरजेंसी”। इसमें इमरजेंसी के अलावा कई व्यक्तियों और घटनाओं पर लेखक की टिप्पणियाँ हैं, जो पढ़ने योग्य हैं। इसी में गांधीजी पर भी एक टिप्पणी लिखी गयी है। लेखक गांधीजी को कई मायनों में महान मानते हैं लेकिन उनकी कई आदतें लेखक की समझ से परे हैं। लेखक ने लिखा है कि गांधी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। बिना अपनी पत्नी की सहमति से उन्होंने ब्रम्हचर्य का व्रत लिया और अपनी यौनेच्छा को नियंत्रित करने के परीक्षण के लिए वो युवतियों से मालिश करवाते थे। ब्रम्हचर्य वाला हिस्सा छोड़ दिया जाए तो यहाँ तक सब सही था लेकिन लेखक ने अगली ही पंक्ति में एक सोच में डाल देने वाला प्रश्न उठाया। यह कि गांधी जो भी परीक्षण करते हों लेकिन वो यह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते यदि कस्तूरबा(उनकी पत्नी) भी अपनी इच्छाओं की पवित्रता को सिद्ध करने के लिए युवा पुरुषों से अपनी मालिश करवातीं। यह प्रश्न बहुत गंभीर है और सीधे-सीधे हमारे सोच के आधार पर चोट करता है। हममें और हमारे समाज की सोच में पितृसत्ता इतनी अधिक रच-बस गई है कि हम अपने आदर्शों में भी उसका अंश डाल देते हैं। हम उस आदर्श सोच की बड़ी प्रशंसा करते हैं लेकिन हम यह ध्यान नहीं दे पाते कि यदि यही आदर्श स्त्री के लिए मानक हो जाएं तो शायद समाज के लिए यह स्वीकार्य न हो। आज चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा है, यानी आज ही से अगले 9 दिन तक चैत्र नवरात्रि मनाई जाएगी। नवरात्रि यानी कि समाज में स्त्री की भूमिका और उसके महत्व के प्रति श्रद्धानत होने का त्योहार। लेकिन इन 9 दिनों और शारदीय नवरात्रि ने 9 दिनों को छोड़कर हम कितनी बार कोई भी सामाजिक फैसला एक स्त्री के दृष्टिकोण से करते हैं? यदि गौर से देखा जाए तो स्त्री और पुरुष का आँकलन करने के लिए हम बार अलग तराजुओं का प्रयोग करते हैं। और यह अभी से नहीं सैकड़ों सालों से चला आ रहा है। गाँधी रामराज्य की परिकल्पना करते थे, लेकिन यदि रामचरितमानस में रामराज्य को देखें तो यह पाएँगे की उसमें पितृसत्ता को बहुत ही आदर्श रूप में दिखाया गया है। और वह स्त्री जो पितृसत्ता को यथावत अपना लेती है उसे उत्तम स्त्री माना जाता है। उदाहरण के तौर पर जब युद्ध जीतने के बाद सीता राम के पास आती हैं तो तुलसीदास यह लिखते हैं कि राम ने सीता को बहुत कटु वचन कहे जिसके बाद मजबूर हो कर सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी (लंकाकांड, 108वें दोहे के बाद की चौपाइयाँ)। मानस के ही अरण्यकांड के 23वें दोहे के बाद की चौपाइयों में तुलसी लिखते हैं कि राम(मनुष्य लीला के लिए) सीता के असली रूप को अग्नि में समर्पित करने को कहते हैं और उनकी जगह सीता की एक छायामूर्ति प्रकट होती है। अब जब तुलसी एक बार लिख चुके हैं कि नकली सीता का हरण हुआ था तो फिर अग्निपरिक्षण का क्या तुक रह जाता है? लेकिन क्योंकि स्त्री को अपनी शुद्धता सिद्ध करनी थी, इसलिए अग्नि परीक्षा ज़रूरी थी ताकि पितृसत्तात्मक सोच के सामने एक आदर्श स्त्री की छवि स्थापित हो। (सीता रावण के यहाँ रहीं थी इसलिए उन्हें शुद्धता सिद्ध करनी थी, राम सुग्रीव के यहाँ रहे थे लेकिन उन्हें शुद्धता का कोई प्रमाण नहीं देना पड़ा.... बहरहाल....)। उनकी अग्नि परीक्षा के बाद सारी वानर सेना खुशी से झूमने लगती है।
राम की छवि या लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाना मेरा मकसद नहीं है लेकिन यह समझना जरूरी है कि जिन ग्रन्थों और कहानियों को हम अपना आदर्श मानते हैं, कई बार उनमें भी कुछ आलोचनात्मक बिंदु होते हैं जिनपर विचार किया जाना चाहिए। मैं इस बात को नकार नहीं सकता कि मेरे अंदर भी पितृसत्तात्मक गुण हैं क्योंकि मेरी परवरिश और समाज की बनावट ही ऐसी रही कि इसका दूसरा पक्ष देखने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। लेकिन हमें अपने जीवन के जुड़े हर एक पहलुओं के बारे में सोचना चाहिए कि हम कब-कब अपनी दृष्टि को लैंगिक रूप से आसमान कर देते हैं। यह सोच हमें बदलने पर थोड़ा मजबूर तो ज़रूर करेगी। अपने अंदर के पुरुष-प्रधानता वाली सोच को सुधारने के लिए मुझे निजी स्तर पर यह उपाय कारगर लगा।
नोट- राम और गांधी को मैं भी आदर्श मानता हूँ क्योंकि उन्हीं के आदर्शों से मुझे उनकी आलोचना करने का बल मिलता है।