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Tuesday, 28 April 2020
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Wednesday, 25 March 2020
गांधी, रामराज्य और स्त्री...
Monday, 24 February 2020
इमरजेंसी का समर्थन क्यों किया था खुशवंत सिंह जैसे बड़े पत्रकार ने??
कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ:
• 16 दिसम्बर 1971- पाकिस्तानी फ़ौज का आत्मसमर्पण और भारत-पाक युद्ध की समाप्ति, भारत विजयी हुआ
• मार्च 1972- इंदिरा गांधी की भारी बहुमत के साथ लोकसभा चुनावों में जीत
• 20 दिसम्बर 1973- मेस की बढ़ी हुई फीस को लेकर गुजरात के छात्रों के द्वारा नवनिर्माण आन्दोलन शुरू
• 18 मार्च 1974- बिहार के छात्रों द्वारा बिहार आन्दोलन और मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की सरकार को बर्खास्त करने की मांग
• 8 अप्रैल 1974- जयप्रकाश नारायण द्वारा बिहार आन्दोलन से सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान
• 2 मई 1974- जोर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलकर्मचारियों का राष्ट्रव्यापी हड़ताल
• 12 जून 1975- चुनावी कदाचार के मामले में जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा की अध्यक्षता में इलाहबाद हाई कोर्ट द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को दोषी माना गया। रायबरेली संसदीय क्षेत्र को अमान्य घोषित किया गया और इंदिरा गांधी के उपर अगले 6 सालों तक किसी भी निर्वाचित पद पर रहने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
• 23 जून 1975- इंदिरा गांधी हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयीं
• 24 जून 1975- सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस वीके कृष्ण अय्यर ने सज़ा में थोड़ी ढील देते हुए यह फैसला सुनाया कि इंदिरा गांधी अपने पद पर बनी रह सकती हैं लेकिन संसद सदन में उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होगा।
• 25 जून 1975- रात 12 बजे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी।
• 26 जून 1975- प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के माध्यम से आपातकाल की घोषणा की
प्राक्कथन
“एक संवाददाता के लिए उस खबर को लिखना सबसे मुश्किल होता है जो वह जानता है कि नहीं छपेगी।” यह कथन वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर ने अपनी किताब “इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी” में लिखा है। नय्यर के ये शब्द हमें इस बात का आभास दिलाने के लिए काफी हैं कि आपातकाल के दौरान प्रेस और पत्रकारों की स्वतंत्रता की स्थिति क्या थी। अनेक राजनीतिज्ञ, पत्रकार, शिक्षाविद और सरकारी सेवाओं के अफसर इमरजेंसी के दौर को आज़ाद भारत का सबसे काला समय बताते हैं। यह वह दौर था जब रातों-रात भारत के हर एक नागरिक से उनके मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे और उनपर हो रहे अन्यायों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हर एक नेता को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया था। कैद हुए राजनैतिक बंदियों को जेल में कोई अलग व्यवस्था नहीं दी गयी थी और कुछ नेताओं को तो खतरनाक आरोपियों के साथ भी रहना पड़ा था। भारत का संविधान, जिसके शक्तिशाली होने का दम्भ हमेशा गर्व से भरा जाता रहा, उसमें लगातार नए बदलाव लाये गए। प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने संसद में 42वां संशोधन पारित किया जिसे भारत का मिनी संविधान भी कहा जाता है। इस संशोधन के कई प्रावधानों ने संविधान की मूलभावना पर चोट किया जैसे कि न्यायालयों की शक्तियों को सीमित करना, राष्ट्रपति को आपातकाल के विशेष अधिकार देना और मूल अधिकारों की जगह निर्देशक तत्वों को प्राथमिकता देना।आपातकाल के आरम्भ के साथ ही मीडिया और पत्रकारों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया। जिस रात इमरजेंसी लगी थी उसी रात को दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग (जहाँ देश के प्रमुख अख़बारों के दफ्तर और प्रेस थे) की बिजली काट दी गयी थी और अख़बारों पर सेंसरशिप लगा दी गई थी। साथ ही देश के कई पत्रकारों और सम्पादकों को जेल में डलवा दिया गया। यही कारण है कि देश के ज्यादातर पत्रकारों ने आपातकाल को लोकतंत्र का गला घोंटने वाला समय बताया है।
लेकिन देश में कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जिन्होंने इमरजेंसी का खुल कर समर्थन किया। उसमें सबसे प्रमुख नाम आता है खुशवंत सिंह का। खुशवंत सिंह आपातकाल के दौरान बेनेट एंड कोलमैन ग्रुप द्वारा निकाली जाने वाली साप्ताहिक अंग्रेजी पत्रिका दी इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया के प्रधान सम्पादक थे। खुशवंत सिंह ने अपनी पत्रिका के अलावा देश-विदेश की कई पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में अपने लेखों के माध्यम से इमरजेंसी और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का खुल कर समर्थन किया था। खुशवंत सिंह ने न सिर्फ इमरजेंसी लगाने के कारणों को सही ठहराया था बल्कि इमरजेंसी के दौरान सरकार द्वारा उठाये जा रहे लगभग सभी कदमों को देश की तात्कालिक आवश्यकता भी बताई थी। जिस संजय गाँधी को इमरजेंसी का सबसे बड़ा खलनायक कहा गया उन्हें खुशवंत सिंह ने, “वह व्यक्ति जो काम कर के दिखाता है”, की संज्ञा अपनी पत्रिका में दी थी[1]।
खुशवंत सिंह के अलावा कई ऐसे विख्यात लोग थे जिन्होंने इमरजेंसी का खुल कर समर्थन किया था जिनमें, समाजसेवी आचार्य बिनोवा भावे, शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे, उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा प्रमुख रूप से शामिल थे। नेताओं की गिरफ्तारी से नाराज़ देश की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों ने इमरजेंसी का विरोध किया था लेकिन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी एकमात्र ऐसी राष्ट्रीय पार्टी थी जिसने आपातकाल का खुल कर समर्थन किया[2]।
“ मैं तुम्हारे कहे हुए शब्द से भले ही सहमत न रहूँ लेकिन तुम्हारे उस शब्द को कहने के अधिकार की रक्षा अपनी मृत्यु तक करूँगा।”
- वोल्टायरफ्रांसीसी विद्वान व विचारक
विवेचना
1970 के दशक में भारत कई द्रुत परिवर्तनों का साक्षी बना। पाकिस्तान को युद्ध में हराना, एक नए देश के जन्म में मदद करना, एक प्रधानमंत्री का पहली बार पद पर रहते हुए कोर्ट में जाना और उन्हें सज़ा होना, देश को आपातकाल की विभीषिका देखना और केन्द्र में पहली बार एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनना। हालाँकि इन सभी घटनाओं में सबसे ज्यादा चर्चित और विवादित आपातकाल ही रहा है। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून 1975 की रात 12 बजे देश में आंतरिक आपातकाल लगा दिया। अगले दिन 26 जून 1975 की सुबह 8 बजे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के माध्यम से यह घोषणा की कि राष्ट्रपति ने देश में आपातकाल लगा दिया है और इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।
यदि हम इमरजेंसी को लेकर जितने भी लेख, विश्लेष्ण, रिपोर्ट इत्यादि पढेंगे, उनमें हम इमरजेंसी की आलोचना ही अधिक पाएंगे। इमरजेंसी के समर्थन से सम्बन्धित विचार हमें कम ही मिलते हैं। खुशवंत सिंह के विचार और उनका पत्रकारीय लेखन इमरजेंसी के समर्थन में एक अलग धारा प्रस्तुत करता है जिसे कई कारणों से अधिक महत्व नहीं दिया गया। चाहे वह राजनैतिक कारण हो या निजी रोष, लेकिन इंदिरा गांधी के बाद आने वाली सरकारों ने इमरजेंसी का केवल नकारात्मक पक्ष ही लोगों के सामने रखा। इमरजेंसी को लेकर प्रेस और मीडिया में भी बहुधा विरोध की प्रतिक्रिया ही रही। तो सवाल यह उठता है कि प्रेस पर लगने वाले तमाम प्रतिबंधों के बावजूद खुशवंत सिंह जैसे वरिष्ठ पत्रकार ने इमरजेंसी का समर्थन क्यों किया?
खुशवंत सिंह ने कई लेखों और साक्षात्कारों में इस प्रश्न का जवाब दिया है। खुशवंत सिंह का इमरजेंसी को समर्थन देने के महत्वपूर्ण कारण निम्न हैं:
• जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन का अलोकतांत्रिक होना
• जेपी के आन्दोलन में भ्रष्ट और अवसरवादी नेताओं का जमावड़ा होना
• संजय गाँधी का पंचसूत्रीय कार्यक्रम और जनसंख्या नियन्त्रण नीति
इन सभी कारणों को प्रथम दृष्टया देखने पर यह लगता है कि इन बिन्दुओं से इमरजेंसी का समर्थन कैसे किया जा सकता है। जयप्रकाश नारायण का सम्पूर्ण आन्दोलन तो भारत के लोकतंत्र को बचाने की एक मुहिम थी, उसे अलोकतांत्रिक कैसे बताया जा सकता है? वह जनसंख्या नीति जिसकी आलोचना इमरजेंसी के दौरान तो हुई ही उससे कहीं ज्यादा आलोचना इमरजेंसी के बाद हुई, उस नीति से इमरजेंसी का समर्थन कैसे किया जा सकता है? खुशवंत सिंह ने इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश की है। उनके विचारों का विश्लेष्ण निम्न है:
1. जेपी का सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन अलोकतांत्रिक था
खुशवंत सिंह आरम्भ में जयप्रकाश नारायण को एक अच्छा और महान व्यक्ति मानते थे। खुशवंत सिंह का कहना था, “जेपी एक हिम्मती व्यक्ति हैं जो दबे हुए लोगों और मुद्दों को आवाज़ देने की कोशिश करते हैं।” [3] 1965 में बिहार में जब अकाल पड़ा था तब जेपी समाजसेवा में लगे हुए थे और उस समय खुशवंत सिंह ने उनके साथ कुछ दिन बिताये थे। जेपी ने समूचे बिहार में राहतकार्य अभियान चलाया था और लोगों से अपील कर रहे थे कि वे अकाल से पीड़ित लोगों को खाना और कपड़े दान करें।लेकिन वक्त के साथ खुशवंत सिंह की जेपी के प्रति यह धारणा बदली। तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जब देशव्यापी आन्दोलन होने लगे तब जेपी ने आन्दोलन की कमान संभाली और और सरकार के खिलाफ सम्पूर्ण क्रांति की घोषणा कर दी। सम्पूर्ण क्रांति, बिहार के छात्र आन्दोलन का एक परिष्कृत रूप था। 18 मार्च 1974 को बिहार के छात्रों ने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर का इस्तीफा माँगते हुए आन्दोलन शुरू किया था। छात्रों के आग्रह पर जयप्रकाश नारायण ने इस आन्दोलन का नेतृत्व स्वीकार किया और 8 अप्रैल 1974 को इस आन्दोलन को सम्पूर्ण क्रांति का नाम दे दिया। यह आन्दोलन महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आन्दोलन की तर्ज़ पर चलाया गया था जिसमें सभी सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों, छात्रों, शिक्षकों और पुलिसवालों को अपनी ड्यूटी छोडकर सरकार के साथ असहयोग करने को कहा गया। तब उस छात्र आन्दोलन का हिस्सा रहे बिहार के राष्ट्रीय जनता दल के वर्तमान नेता शिवानन्द तिवारी के अनुसार जेपी ने पटना के गाँधी मैदान से आह्वान किया, “यदि जयप्रकाश का आदेश मानते हो तो जयप्रकाश का आदेश है, उस दिन गाड़ियाँ नहीं चलेंगीं, दुकानें नहीं खुलेंगीं, सब कुछ ठप्प रहेगा। बोलो! मानते हो जयप्रकाश का आदेश?” और इस वाक्य के साथ मैदान में मौजूद हजारों लोगों के हाथ एक साथ उठते थे और आवाज़ आती थी, “हाँ” [4]। यह आन्दोलन धीरे-धीरे बिहार से बढ़ कर दिल्ली तक पहुँच गया और देशव्यापी समर्थन के साथ सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन का लक्ष्य इंदिरा गांधी का इस्तीफा बन गया।
दिल्ली में इस आन्दोलन को बल तब मिला जब 12 जून 1975 को इलाहबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गाँधी पर चुनावी कदाचार के मामले में सजा सुनाते हुए उन पर अगले 6 साल तक किसी भी निर्वाचित पद पर रहने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इंदिरा इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयीं जहाँ 24 जून को जस्टिस वीके कृष्ण अय्यर ने उनकी सज़ा में थोड़ी ढील देते हुए उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का अधिकार तो दिया पर संसद में वोट देने के अधिकार पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस फैसले के बाद जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान से यह घोषणा की कि जब तक इंदिरा गांधी इस्तीफा नहीं दे देतीं तब तक क्रांति चलती रहेगी। जेपी ने मैदान में मौजूद सभी लोगों से संसद भवन और सासदों के घरों का घेराव करने को कहा।
खुशवंत सिंह ने इस आन्दोलन का विरोध किया क्योंकि खुशवंत सिंह का यह मानना था कि इस आन्दोलन से देश में अराजकता का स्तर बढ़ गया था। स्कूल-कॉलेजों में ताले लगा दिए गए थे और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को उनका काम करने से रोका जा रहा था। 27 अक्टूबर 2004 को खुशवंत सिंह ने रेडिफ़ न्यूज़ के पत्रकार अम्बरीश काठेवाड़ दीवानजी को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “मेरे अनुसार जेपी ने दिल्ली में विशाल रैली का नेतृत्व कर के एक बहुत बड़ी गलती की थी। जेपी ने जनता से सांसदों के घरों का घेराव करने को कहा था। गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन में भी इसी तरह आन्दोलन हुए थे जिसके बाद भीड़ ने गुजरात विधानसभा पर हमला कर दिया था। जयप्रकाश द्वारा संसद का घेराव करने का आदेश गुजरात जैसी घटना को दोहरा सकता था जो कि लोकतंत्र के लिए खतरा था। यह आन्दोलन लोकतांत्रिक सीमाओं को लांघ रहा था।” [5]
6 अप्रैल 1975 को दी इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया के अंक की कवर स्टोरी का शीर्षक था Total Revolution। इस 8 पन्नों के विस्तृत लेख को पत्रिका के सम्पादक खुशवंत सिंह ने खुद लिखा था। इस लेख में खुशवंत सिंह ने सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन की काफी आलोचना की थी। खुशवंत सिंह ने लिखा कि “जेपी की सम्पूर्ण क्रांति वाली वर्तमान विचारधारा विरोधाभासों से भरी हुई है। जेपी की बातों से ऐसा लगता है मानो वो अपने आपको गैरीबाल्डी, लेनिन और महात्मा गाँधी का सम्मिश्रण मानते हों। चुने हुए प्रतिनिधियों को उनका काम करने से रोकना उन सभी नियमों को नज़रंदाज़ करता है जो एक लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार के लिए बनाये गए हैं। एक बार जब प्रतिनिधि वैध तरीके से चुन लिया जाता है तो उस पर काम न करने का दबाव नहीं बनाना चाहिए। यह जनता पर छोड़ देना चाहिए की उसका कार्यकाल ख़त्म होने पर वह उसे फिर से चुनती है या नहीं। यही एक स्वस्थ लोकतंत्र की प्रक्रिया है और जेपी का आन्दोलन इसी लोकतान्त्रिक भावना को नष्ट कर रहा है।”
30 मार्च 1975 को अमेरिका के मशहूर अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स में खुशवंत सिंह का एक लेख छपा जिसमें उन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति के पूरे विचार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने लिखा, “जेपी के भाषणों से लगता है कि उनका लक्ष्य है कि भारत के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक मूल्यों को एक झटके में पलट दिया जाए। उनका पहला निशाना देश की विधानसभाएँ हैं जिसमें से सबसे ऊपर बिहार की विधानसभा है। जेपी का आन्दोलन केवल युवाओं को उत्तेजित करता है कि वे अपने सारे कम छोड़ कर लाठियाँ खाएँ, गोलियाँ झेलें और जेलों को भरते जाएँ।”
इस लेख में खुशवंत ने आगे लिखा कि, “जेपी ने हिंसा का विरोध करते हुए कहा था, “हमें गाँधी तक वापिस जाना होगा, तोड़फोड़ और लूट से क्रांति सम्भव नहीं है। हालाँकि अहिंसा केवल जेपी के भाषणों तक ही देखने को मिली। इसी साल जनवरी में बिहार के कुछ नौजवानों ने केन्द्रीय रेलमंत्री ललित मिश्र की हत्या तब कर दी जब वे बिहार में एक नई रेलवे लाइन का उद्घाटन करने पहुंचे थे। जेपी के समर्थकों ने इसे सरकार द्वारा प्रायोजित हत्या बताया। घटना के कुछ समय बात हत्या से जुड़े लोगों ने घटनास्थल के आसपास पर्चियाँ बाँटीं जिसमें इंदिरा गांधी के लिए धमकी लिखी थी- “दमन करना छोडो, वरना मरो, शहीद की तरह नहीं, एक पापी की तरह।” [6]
खुशवंत सिंह का मानना था कि जेपी भले ही अपने बड़े जनाधार की बात कहते हों लेकिन इसमें सच्चाई बहुत कम है। यदि बिहार के 90% लोग भी जेपी का साथ देते तब भी देश के बाकी हिस्सों के लोग केवल अपने निजी कारणों से इंदिरा सरकार के विरोध में थे, उन्हें जेपी के लक्ष्य से कोई सरोकार नहीं था। छात्रों और सरकारी नौकरों के अलावा जेपी को महज़ कुछ अवसरवादी नेताओं का ही समर्थन था। किसान और मजदूर वर्ग जेपी के इस आन्दोलन से दूर था। देश के अधिकतर ट्रेड यूनियन जो की कांग्रेस और कम्युनिस्टों द्वारा नियंत्रित थे, उन्होंने पहले ही इस आन्दोलन का समर्थन करने से इनकार कर दिया था।[6]
जैसे ही इमरजेंसी लगी, देश ने राहत की सांस ली। स्कूल और कॉलेज खुल गए, ट्रेनें समय पर चलने लगीं, सरकारी कमचारी अपने दफ्तरों में वापिस जाने लगे। देश फिर से सामान्य होने लगा था।[5]
2. जेपी के समर्थक- अवसरवादियों की फ़ौज
खुशवंत सिंह के अनुसार सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन के समय जितने भी राजनैतिक दलों के नेता खुद को जेपी के अनुयायी बता रहे थे वे सब के सब अवसरवादी थे। अवसरवादियों का यह जत्था लोकतंत्र के प्रति आस्था के कारण नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी के प्रति राजनैतिक द्वेष के कारण एक हुआ था।[3] मोरारजी देसाई, चरण सिंह, बाबू जगजीवन राम जैसे कांग्रेस के कद्दावर नेता पार्टी का दामन छोड़ कर इस आन्दोलन से जुड़े थे। बाबू जगजीवन राम तो वह नेता थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने एक बार राष्ट्रपति बने के लिए अपना समर्थन भी दे दिया था।खुशवंत सिंह का यह मानना था कि विपक्ष में बैठे सारे नेता और वो नेता जो कभी कांग्रेस पार्टी के वफादार हुआ करते थे वे इस आन्दोलन को आनंद के तौर पर ले रहे थे। उन सभी नेताओं को यह आन्दोलन, सत्ता हथियाने का एक शॉर्टकट तरीका लग रहा था।[5]
खुशवंत सिंह हमेशा से धर्म को राजनीति से अलग रखने की बात करते थे। खुशवंत सिंह ने महात्मा गाँधी की उस नीति की कड़ी आलोचना की है जिसमें गाँधी कहते हैं कि एक नेता को धार्मिक आचरण के साथ सत्ता संभालनी चाहिए।[7] जेपी के इस आन्दोलन से जनसंघ को भी जोड़ा गया। जनसंघ के कद्दावर नेता, लाल कृष्ण अडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी जेपी की प्रमुख रैलियों में मंच साझा किया करते थे। आरम्भ में आन्दोलन से जुड़े कई समजवादी नेताओं ने जनसंघ पर सांप्रदायिक पार्टी होने का आरोप लगाया और जेपी को सलाह दी कि जनसंघ को इस आन्दोलन से दूर रखना चाहिए। हालाँकि जयप्रकाश नारायण ने उन सलाहों को दरकिनार कर सभी विचारधाराओं को साथ आने के लिए कहा। जयप्रकाश नारायण ने जनसंघ की रैली में यहाँ तक कह दिया कि “यदि जनसंघ फासीवादी है तो मै भी फासीवादी हूँ।” [8] खुशवंत सिंह जेपी की इस कदम से भी नाखुश थे।
3. संजय गाँधी के पंचसूत्रीय योजना की सराहना:
पूरे इमरजेंसी के दौरान यदि किसी एक व्यक्ति की सबसे अधिक आलोचना की गयी, तो वह थे संजय गाँधी। संजय गांधी का तानाशाही रवैया, उनकी कठोर नीतियाँ और उनका राजनैतिक जिद्दीपन सबसे ज्यादा निशाने पर था। कई नेता और पत्रकार संजय गाँधी को इमरजेंसी का असली दोषी मानते हैं। कई लोगों ने आरोप लगाया कि इमरजेंसी के दौरान देश की असली शासक इंदिरा नहीं बल्कि संजय गांधी थे।संजय गाँधी ने इमरजेंसी में शासन के लिए पंचसूत्रीय योजना शुरू की जिसमें कि निम्नलिखित 5 योजनाएँ शामिल थीं-
• साक्षरता
• अनिवार्य परिवार नियोजन
• वृक्षारोपण
• जातिवाद का खात्मा
• दहेज़ प्रथा का अंत
संजय गाँधी भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियन्त्रण में लाने के लिए अनिवार्य परिवार नियोजन की नीति पर अमल करवाने की ठान चुके थे। सभी कांग्रेस शासित राज्यों में राज्य सरकारों द्वारा जबरन नसबंदी अभियान शुरू कर दिया गया। 18 अक्टूबर 1976 को उत्तरप्रदेश के मुज्जफरनगर में नसबंदी के विरोध में नाराज़ जनता ने जिला स्वास्थ्य केंद्र को आग के हवाले कर दिया। जिला प्रशासन ने विरोध को दबाने के लिए पुलिस बुलाई। पुलिस की फायरिंग में 50 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गयी। जनता के बीच नसबंदी को लेकर कई नारे प्रचलित होने लगे। उनमें से एक था-
जमीन गयी चकबंदी में
मकान गया हदबंदी में
द्वार खड़ी औरत चिल्लाए
मरद गया नसबंदी में
खुशवंत सिंह संजय गाँधी की नीतियों के समर्थक थे। संजय के लिए खुशवंत का मानना था- “वह व्यक्ति जो काम कर के दिखाता है” [1]। संजय गाँधी एक ऐसे व्यक्ति थे जो बोलने में कम और करने में ज्यादा विश्वास करते थे। वह जिस बदलाव के बारे में सोच लेते थे उसे ला कर ही मानते थे। संजय ने अपने युवा कन्धों पर देश में क्रान्तिकारी सुधार लाने का बहुत भारी बोझ ले रखा था।[9]
खुशवंत सिंह का मानना था कि इस बात में बिलकुल सच्चाई नहीं है कि देश के असली शासक संजय थे या संजय ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। संजय केवल एक प्रधानमंत्री के बेटे थे जो देश में सुधार लाने की इच्छा रखते थे। परिवार नियोजन लिए सरकार द्वारा लिए गए पिछले सभी कदम विफल रहे थे इसलिए संजय का, परिवार नियोजन की नीति को प्राथमिक आवश्यकता मानना बिलकुल सही था।[7]
दी इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया पत्रिका के लिए खुशवंत सिंह ने संजय गांधी का साक्षात्कार किया था जिसमें संजय गाँधी ने शासन के प्रेसिडेंशियल सिस्टम की तारीफ की और अनिवार्य नसबंदी का पक्ष रखा।[1]
संजय गांधी ने शहरों के सौन्दर्यीकरण और वृक्षारोपण पर भी बल दिया था। संजय गाँधी ने पुरानी दिल्ली की झुग्गियों को साफ़ कराने के निर्देश दिए। निर्देश का पालन करते हुए डीडीए के उपाध्यक्ष जगमोहन मल्होत्रा ने जामा मस्जिद के आसपास स्थित झुग्गियों पर बुलडोज़र चलवा दिया था। इस कदम से संजय पर आरोप लगा कि करीब 30 हज़ार से अधिक लोग इस फैसले से बेघर हो गए।
हालाँकि खुशवंत सिंह ने इस कदम को बहुत ही ज़रूरी बताया था। खुशवंत सिंह ने संजय का बचाव करते हुए यह कहा था कि यदि झुग्गियाँ हटाई गयीं थीं तो सभी प्रभावी लोगों को यमुना पार के क्षेत्र में पुनर्वासित भी किया गया था।[6]
खुशवंत सिंह ने संजय गांधी के कई ऐसे फैसलों का समर्थन किया था। आगे चल कर खुशवंत सिंह ने यह कहा था कि, “यदि संजय जिंदा होते तो कानून व्यवस्था अच्छी होती और देश का विकास बहुत तेज़ी से होता, हाँ लेकिन लोकतंत्र नहीं होता यह मैं दावे से कहता हूँ।” [9]
उपसंहार
इमरजेंसी का समर्थन करने के लिए खुशवंत सिंह काफी आलोचना हुई। न सिर्फ पत्रकारिता समूहों में बल्कि राजनैतिक गलियारों में भी उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाये गए। उन्हें इंदिरा गांधी का करीबी बताया गया और यह आरोप भी लगाया गया की संजय का लगातार समर्थन करने के कारण ही न तो खुशवंत सिंह की पत्रिका पर प्रतिबन्ध लगा और न ही उन्हें जेल हुई।हालाँकि खुशवंत सिंह ने इन सभी आरोपों और आलोचनाओं को सिरे से दरकिनार किया है। खुशवंत सिंह ने समय-समय पर इमरजेंसी को लेकर अपने विचार और अपनी स्थिति स्पष्ट की है। दी इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया से अलग होने बाद उन्होंने विभिन्न माध्यमों से अपनी बातों को रखा। साल 2000 में खुशवंत सिंह ने एक किताब लिखी- Why I Supported The Emergency। इस किताब के माध्यम से उन सभी कारणों का ज़िक्र किया गया है जिनकी वजह से खुशवंत सिंह ने इमरजेंसी का समर्थन किया था।
सन्दर्भ:
1- दी इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया, अगस्त 1976, स्वतन्त्रता दिवस अंक
2- Left right and centre who supported emergency, called it a festival of discipline, इंडिया टुडे, 25 जून 2019
3- Total Revolution, खुशवंत सिंह, दी इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया, 6 अप्रैल 1975
4- एबीपी न्यूज़, प्रधानमंत्री सीरीज़, एपिसोड-12, 29 सितम्बर 2013
5- रेडिफ न्यूज़, अम्बरीश कठेवाड़ दीवानजी के साथ साक्षात्कार, 27 अक्टूबर 2004
6- A new wave from the old India, खुशवंत सिंह, न्यूयॉर्क टाइम्स, 30 मार्च 1975
7- Why I Supported The Emergency, Penguin Publications, खुशवंत सिंह, 2000
8- If Jansangh is facist then I too am facist, My Country My Life, लालकृष्ण अडवाणी की आत्मकथा।
9- Of love and malice, Khushwant Singh and the Gandhis, फर्स्टपोस्ट, 21 मार्च 2014
Friday, 25 October 2019
कार्तिक की हवा
Tuesday, 17 September 2019
खाड़ी में बढ़ते तनाव से भारत में तेल संकट गहराने के आसार
सऊदी में ड्रोन हमले से कच्चे तेल की कीमत बढ़ कर हुई 71.95 डॉलर प्रति बैरल;
भारत में तेल की कीमतों में भारी बढ़त की आशंका;
ट्रम्प ने ईरान को ज़िम्मेदार मानते हुए दिए सैन्य कार्यवाही के संकेत;
आशुतोष
17 सितम्बर । नई दिल्ली
सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल उत्पादन कम्पनी, अरामको के संयंत्र पर शनिवार को हुए ड्रोन हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 20% बढ़ कर अब 71.95 डॉलर प्रति बैरल हो गई है। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ना शुरू हो चुका है। सोमवार को रुपये की कीमत 71.60 प्रति डॉलर हो गई वहीं, सेंसेक्स भी 261.68 अंक लुढ़क कर 37,123.31 अंक पर बन्द हुआ।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमत को देखते हुए भारतीय तेल कम्पनियों ने भी पेट्रोल-डीज़ल के दामों में बढ़ोत्तरी के संकेत दिए हैं। हिंदुस्तान पेट्रोलियम के निदेशक एमके खुराना ने एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में बताया कि यदि इसी तरह कच्चे तेल की कीमत बढ़ती रही तो भारत में तेल की कीमतों में भारी बढ़त हो सकती है। गौरतलब है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है जो अपनी 80% तेल की और 18% प्राकृतिक गैस की आपूर्ति आयात से के माध्यम से करता है, जिसमें से 20% वह सऊदी अरब से आयात करता है। ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमत में 1 डॉलर प्रति बैरल का इज़ाफा होता है तो भारत पर सालाना रूप से 10,700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। स्थितियों ने एक बार फिर सरकार द्वारा तेल की कीमत तय करने की नीति लागू करने की बहस को आगे कर दिया है।
हालाँकि भारत सरकार के कुछ अधिकारियों ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर यह बताया है कि वर्तमान स्थितियों के बावजूद सऊदी अरामको, अन्य बन्दरगाहों से भारत को अनुबन्ध के अनुसार तेल की आपूर्ति करेगा। भारत पेट्रोलियम के निदेशक आर रामचन्द्रन ने बताया कि अरामको ने एक दिन पहले ही करार की गई कच्चे तेल से भरे जहाज़ को भारत की ओर रवाना कर दिया है, साथ ही 20 लाख टन कच्चे तेल के आयात के लिए अग्रिम करार भी कर लिया है।
आरबीआई गवर्नर ने जताई चिंता
आरबीआई गवर्नर शशिकांता दास ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में संकेत दिए कि तेल कीमतों में बढ़ोत्तरी के कारण भारत में चालू खाता एवं राजकोषीय घाटे को धक्का लग सकता है। उन्होंने कहा, "हम स्थितियों पर नज़र बनाये हुए हैं और यदि यह संकट बना रहता है तो यह भारत के राजकोषीय घाटे को असर करेगा। यहाँ पर यह देखना आवश्यक होगा कि भारत कितनी जल्दी तेल आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों के लिए कदम उठाता है।"
क्या है यह पूरा मामला
सऊदी अरब में स्थित अरामको तेल कम्पनी के अकबैक संयंत्र पर शनिवार तड़के एक ड्रोन द्वारा हमला किया गया था जिससे संयंत्र के महत्वपूर्ण हिस्सों को क्षति पहुँची है। हमले से सऊदी अरब द्वारा अन्य देशों को तेल आपूर्ति बाधित हो गई है। भारत, रूस, चीन समेत कई देशों ने इस हमले की निंदा की है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि "भारत 14 सितम्बर को अकबैक तेल संयंत्र व खुरैस तेल कूपों पर हुए हमले की निंदा करता है। हम आतंकवाद के हर स्वरूप का विरोध करने के लिए कटिबद्ध हैं।"
अमरीका ने ईरान को ठहराया दोषी
अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉमपियो ने ईरान को हमले का दोषी ठहराया है। वहीं इराक और उसके समर्थकों ने भी हमले में ईरानी हथियारों के प्रयोग की बात कहते हुए ईरान को ही ज़िम्मेदार बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्वीट में सैन्य कार्यवाही के संकेत देते हुए कहा कि अमरीका तेल के लिए पूरी तरह से आत्मनिर्भर है आई और उसे खाड़ी से तेल की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन अमेरिका पूरी तरह से अपने साथी देशों की मदद करेगा। इस पर रूस, यूरोपीय संघ और चीन ने अमेरिका और ईरान से संयम बरतने को कहा है।
Saturday, 14 September 2019
हिंदी और उसका बड़ा दिल
किसी भी राष्ट्र, समाज अथवा संस्कृति की उन्नति इस पर निर्भर करती है कि वे कितने समावेशी हैं। यही सिद्धांत भाषा पर भी लागू होता है। हिंदी, एक समावेशी भाषा होने का उत्कृष्ट उदाहरण है। देखा जाए तो स्वाधीनता के सौ वर्ष पहले तक हिंदी का कोई ठोस अस्तित्व नहीं था लेकिन यह हिंदी के समावेशी और बहुवचनीय गुण ही थे जिस कारण आज यह विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा बन चुकी है। मध्यकालीन इतिहास के स्रोतों में सिंधु नदी के पूर्वी और जितनी भाषाएँ बोली गयी हैं उन्हें "हिन्दवी" (जिसमें आधुनिक हिंदी की जड़ें खोजी जाती हैं) कहा गया है। लेकिन उन सारी भाषाओं को एक सूत्र में पिरो कर समन्वय के साथ एक ऐसी भाषा का निर्माण किया गया जिसने उत्तर और मध्य भारत मे राष्ट्र चेतना की आधारशिला स्थापित की, जिस पर खड़े हो कर भारत के स्वतन्त्रता संग्राम और लोकतंत्र ने मज़बूती पाई। और यह उसी लोकतंत्र की सुंदरता है कि लगभग आधे राष्ट्र द्वारा बोले जाने के बावजूद इसे राष्ट्रभाषा नहीं बनाया गया क्योंकि हिंदी और हिंदुस्तानी के लिए देश में बोले जाने वाली हर भाषा राष्ट्रभाषा के समान है। आज हिंदी का स्वरूप बदल रहा है क्योंकि यह समय की माँग है। आधुनिकता, भूमण्डलीकरण और व्यवसायीकरण ने हिंदी को नए आयाम प्रदान किये हैं। कम्प्यूटर, इंटरनेट और सरकारी सेवाओं में हिंदी के प्रयोग ने हमारा जीवन सहज बनाने में बहुत मदद की है। यह सत्य है कि आज हिंदी में अंग्रेज़ी शब्दों और तरीकों का चलन बढ़ गया है पर हिंदी ऐसे ही कई भाषाओं का समाहार है और बिना किसी विवाद के सभी भाषाओं को गले लगाने की हिंदी की यह विशेषता शाश्वत बनी रहेगी।
©आशुतोष तिवारी
Wednesday, 21 August 2019
मध्यममार्ग- सबसे कठिन मार्ग
मैग्सेसे पुरस्कार की घोषणा के बाद रविश के द्वारा दिए गए धन्यवाद सम्बोधन में उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु को रखा। उन्होंने कहा कि यदि एक भी दर्शक खबरों और सूचनाओं के किनारे खड़े रह कर सही-ग़लत को पहचानने की इच्छा रखता है या पहचान करने की कोशिश भी करता है, तो इसका मतलब सुदृढ़ पत्रकारिता अभी सुरक्षित है।
आज के दौर में चाहे आप अख़बार पढ़ें, न्यूज़ चैनल देखें, पत्रिकाएँ पढ़ें या यूट्यूब देखें, आप यह स्पष्ट पाएँगे कि अतिवादिता अपने चरम पर है, एक इन्सान का मध्यममार्गी विचारधारा का होना बहुत ही जटिल हो चला है। आलम यह है कि किसी भी राजनैतिक बातचीत में यदि आप निष्पक्ष रहने का सोचें भी तो वादियों के सबसे ज्यादा हमले आप ही पर होंगे और उनके तर्कों से आपको पूर्णतः वैचारिक रूप से पंगु घोषित करने की कवायद की जाएगी।
आज कक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक चर्चा आयोजित की गई थी जिसकी मध्यस्थता के लिए मुझे संचालक बनाया गया था। व्याख्यानों के बाद जब प्रश्नोत्तरी की बारी आई तब आधा दर्जन हाथ एकसाथ प्रश्न पूछने के लिए खड़े हो गए जो कि एक संचालक के लिए धर्मसंकट की स्थिति होती है कि आख़िर किसे मौका दिया जाए।
कुछ यही स्थिति मध्यममार्गी विचारधारकों की होती है जब एक ही घटना पर दो या उससे अधिक विचार उसके समक्ष होते हैं। ऐसी स्थिति में उसे अपनी निष्पक्षता को भी अक्षुण्ण रखनी है और इसका ख़ासा ध्यान भी रखना होता है कि किसी भी विचार पर सहमति जताने पर उसे दायीं या बायीं ओर धकेल न दिया जाए।
हालाँकि देखा जाए तो यह एक आधारभूत मानवीय गुण है कि मानव जिसे सही मानता है, वह चाहता है कि उसके साथ का व्यक्ति भी उसी सही को माने अन्यथा उसका विरोधी घोषित हो जाए। याद कीजिए बचपन जहाँ आप अपने भाई-बहन से लड़ाई करते हों और आपकी माँ आपको लड़ाई के ज़िम्मेदार मान कर दो चपत लगा दे तो वह बाल मन स्वतः ही घोषित कर देता है कि माँ हमेशा उसी का साथ देती है जबकि तब तक हमें विरोध या समर्थन का कोई पारिभाषिक बोध नहीं होता।
पत्रकारिता भी कुछ इन्हीं वैचारिक सिद्धान्तों पर आधारित होती है। कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि पत्रकारिता सरकार के लिए एक पूर्णकालिक विपक्ष है और इसी में उसकी निष्पक्षता निहित है। प्रथम दृष्टया यह वाक्य द्वंद्वात्मक लगेगा पर सच यही है कि पाठक या दर्शक को सही और गलत की पहचान करने की क्षमता पत्रकारिता तभी करा सकती है जब वह विषय का आलोचनात्मक अध्ययन पाठक/दर्शक को पेश करे बिना किसी व्यक्तिगत विचार के। यह पत्रकारों के व्यक्तिगत विचारों के कारण ही है कि हम बड़ी ही सहजता से देश के प्रमुख अखबारों के बारे में कह देते हैं कि यह अति-लेफ्टिस्ट अख़बार है या यह चाटुकार अख़बार है (यह सिद्धान्त चैनलों पर भी लागू है)।
ऐसे में पाठक/दर्शक का मध्यममार्गी होना अतिआवश्यक हो जाता है ताकि खबरों को तौलने का उसका गणित हमेशा सही रहे। हाँ मध्यममार्गी होने पर यदि कोई आप पर अवसरवादी होने का आरोप लगाए तो निश्चिंत रहना ही सही है क्योंकि आधुनिक काल (या कहें कॉरपोरेट काल) तुलनात्मक सत्य को ही सत्य मानता है।
©आशुतोष तिवारी
