वो नई नई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आई थी। सिंह द्वार को दखते ही नतमस्तक हो उठी थी। हाँ यह वही जगह है जहाँ चुन लिए जाने के सपने वो अपनी बारहवीं बोर्ड के परचे लिखते हुए बड़ी शिद्दत से देखती थी। जितना विशाल यह विश्वविद्यालय था उतने ही विशाल उसके ख्वाब थे। गर्व का भाव कूट कूट कर उसके अंदर भरा हुआ था और हो भी क्यों न, आख़िर पूरे देश मे अव्वल दर्जे से पास हो कर वह सर्वविद्या की राजधानी में आई थी।
पर आते ही उसने देखा, की उसकी आज़ादी, उसके सपने, और उसकी उड़ान शाम 8 बजे के बाद खत्म हो जाती थी। कम से कम उसकी सारी दोस्त तो कुछ ऐसा ही कहा करती थीं।
खैर, उसकी माँ ने उसे कान्हा जी की एक तस्वीर दी थी जिसे उसने अपने स्टडी टेबल की सामने वाले दीवार पर चिपका रखा था। एक दिन रात भारत के महापुरुषों पर एक किताब पढ़ते- पढ़ते उसकी नज़र कान्हा जी की तस्वीर पर गई और फर उस किताब पर। उसने किताब के पन्नो को सरसरी तौर पर पलटा और अचनाक ही उसके मन मे ये विचार कौंध पड़ा कि महात्मा गांधी से लेकर नेहरू, पटेल, गोखले, जेपी, मंडेला इत्यादि सब ने जेल में रह कर ही तो बदलाव और स्वाधीनता की पृष्ठभूमि तैयार की थी। कान्हा जी तो पैदा ही कारागार में हुए थे। उसके चेहरे पर एक हँसी थी और जीवन का एक बहुत अच्छा प्रोत्साहन उसे मिल चुका था।
खैर लंका उसके लिए लंका की तरह ही था जहाँ रावणों की कोई कमी नही थी। भगवा गमछा लपेट कर सब भिक्षुक के भेष में ही तो रहा करते थे। हालांकि उन भिक्षुओ के मुख से स्त्रियों के लिए भिक्षामि देहि की जगह "का चौचक माल बा यार" निकला करता था। उसे उन भिक्षुओं से बहुत डर लगता था इसीलिये वह अपनी रूममेट के साथ ही लंका जाया करती थी। उसकी रूममेट आधुनिक विचारों की एक सत्यमूर्ति थी। सच कहें तो वह उसे आदर्श मानने लग गयी थी।
फिर एक रात ऐसी आई जब वो, उसकी रूममेट और उनकी जैसी सैकड़ो लड़कियाँ उसी सिंह द्वार पर लक्ष्मण रेखा बन कर बैठी हुई थीं ताकि कोई भी रावण अपनीं आंख भी न उठा सके। खैर रावण की आंख तो नही उठी लेकिन खाखी चोला पहने कुछ पचास साठ कुम्भकर्णो की लाठियां ज़रूर उठी थी।
लाठी का असर उसके और उसकी रूममेट पर बहुत गहरा पड़ा था। दोनों के मन मे क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी थी। उसने एक दिन अपनी रूममेट को लाल दुपट्टा गले मे गोल बांध कर जाते हुए देखा और सहसा पूछ उठी की कहा जा रही हो। उसने कहा कि सभी अत्याचार और अत्याचारियों को जड़ से उखाड़ने के लिए जिस क्रांति की आवश्यकता है मैं उन क्रांतिकारी लोगो का साथ देने जा रही हूँ, हमें सभी छात्रों के अधिकारों की रक्षा करनी है, तुम भी चलो। उसने मना कर दिया। उसे डर था कि पिछली बार लाठी हाथ पर पड़ी थी अगली बार कहीं सिर ही शिकार न बन जाये। लेकिन उसके भीतर की क्रांति उसे कचोट रही थी। तो उसने भी बदलाव का कदम उठा ही लिया। उसने ठान लिया कि सबसे पहले वो खुद को बदलेगी। खुद को सशक्त बनाएगी और फिर उसी राह पर चलते हुए समाज को सशक्त बनाएगी। उसके अंदर की दुर्गा ने अपना त्रिशूल चुन लिया था कलम के रूप में और धीरे धीरे उसने अज्ञानता के महिषासुर को मारना शुरू कर दिया।
तीन साल यूँ ही निकल गए। उसने CAPF की परीक्षा दी और उसमें भी चयनित हो गयी। स्नातक के तीन साल बाद वह CRPF में असिस्टेन्ट कमांडेंट बन चुकी थी। उसकी मेहनत और BHU के आशीर्वाद ने उसे जो गर्व की अनुभूति दी वो शायद अतुलनीय थी। उसकी पहली पोस्टिंग कश्मीर में हुई थी जहाँ उसका सामना लंका के सिगरेट अड्डों में बसने वाले वाले रावणों से भी खूंखार राक्षसों से हर दिन होता था।
उसने बहुत दिनों बाद फेसबुक खोला। ट्रेनिंग के समय वह चला नही पाती थी और कॉलेज के समय में तो ढोंगियों और स्त्री स्वाधीनता की निंदा करने वाले लोगो की पोस्ट्स से त्रस्त हो कर उसने फेसबुक से नफरत करना शुरू कर दिया था।
खैर उसने एफबी देख ही लिया। कुछ न्यूज़ फीड स्क्रॉल करने पर उसने देखा कि उसके कॉलेज टाइम का एक बदमाश जो अपने समय मे लंका की फब्तियाँ मार्किट का बेताज बादशाह हुआ करता था उसे पुलिस घसीट कर ले जा रही है। उसके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा हुँह, इनका कुछ नही हो सकता। उसने नोटिफिकेशन चेक किया। उसकी बीएचयू वाली रूममेट, जो कि अब जेएनयू वाली हो चुकी थी, उसका जन्मदिन था। रात का ही समय था, उसने उसे फोन लगाया। कुछ देर की घंटी के बाद उसने फोन उठाया तो उसकी आवाज़ के साथ साथ कई लोगो के नारे लगाने की आवाज़ें आ रही थी। उसने कहा हैप्पी बर्थडे.... क्या???.... अरे हैप्पी बर्थडे!!! नहीं समझ मे आया?? हैप्पी बर्थडे बोल रही हूं!!! बर्थडे विश का जवाब तो नहीं आया लेकिन एक आवाज़ ज़रूर आयी कि "भारत तेरे टुकड़े होंगें, इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह" भारत की बर्बादी....... कश्मीर की आज़ादी.... उसने फोन रख दिया आंखें मूंदी और सो गई। उसने सुबह की खबर देखी कि जेएनयू के छात्रों को लाठियों की सलामी मिली। उसने वर्दी पहनी और छावनी ग्राउंड पर पहुच गयी। बटालियन के साथ उसने तिरंगे को सलामी दी और बस यही कहा, लव यू इंडिया....
©अशुतोष तिवारी
पर आते ही उसने देखा, की उसकी आज़ादी, उसके सपने, और उसकी उड़ान शाम 8 बजे के बाद खत्म हो जाती थी। कम से कम उसकी सारी दोस्त तो कुछ ऐसा ही कहा करती थीं।
खैर, उसकी माँ ने उसे कान्हा जी की एक तस्वीर दी थी जिसे उसने अपने स्टडी टेबल की सामने वाले दीवार पर चिपका रखा था। एक दिन रात भारत के महापुरुषों पर एक किताब पढ़ते- पढ़ते उसकी नज़र कान्हा जी की तस्वीर पर गई और फर उस किताब पर। उसने किताब के पन्नो को सरसरी तौर पर पलटा और अचनाक ही उसके मन मे ये विचार कौंध पड़ा कि महात्मा गांधी से लेकर नेहरू, पटेल, गोखले, जेपी, मंडेला इत्यादि सब ने जेल में रह कर ही तो बदलाव और स्वाधीनता की पृष्ठभूमि तैयार की थी। कान्हा जी तो पैदा ही कारागार में हुए थे। उसके चेहरे पर एक हँसी थी और जीवन का एक बहुत अच्छा प्रोत्साहन उसे मिल चुका था।
खैर लंका उसके लिए लंका की तरह ही था जहाँ रावणों की कोई कमी नही थी। भगवा गमछा लपेट कर सब भिक्षुक के भेष में ही तो रहा करते थे। हालांकि उन भिक्षुओ के मुख से स्त्रियों के लिए भिक्षामि देहि की जगह "का चौचक माल बा यार" निकला करता था। उसे उन भिक्षुओं से बहुत डर लगता था इसीलिये वह अपनी रूममेट के साथ ही लंका जाया करती थी। उसकी रूममेट आधुनिक विचारों की एक सत्यमूर्ति थी। सच कहें तो वह उसे आदर्श मानने लग गयी थी।
फिर एक रात ऐसी आई जब वो, उसकी रूममेट और उनकी जैसी सैकड़ो लड़कियाँ उसी सिंह द्वार पर लक्ष्मण रेखा बन कर बैठी हुई थीं ताकि कोई भी रावण अपनीं आंख भी न उठा सके। खैर रावण की आंख तो नही उठी लेकिन खाखी चोला पहने कुछ पचास साठ कुम्भकर्णो की लाठियां ज़रूर उठी थी।
लाठी का असर उसके और उसकी रूममेट पर बहुत गहरा पड़ा था। दोनों के मन मे क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी थी। उसने एक दिन अपनी रूममेट को लाल दुपट्टा गले मे गोल बांध कर जाते हुए देखा और सहसा पूछ उठी की कहा जा रही हो। उसने कहा कि सभी अत्याचार और अत्याचारियों को जड़ से उखाड़ने के लिए जिस क्रांति की आवश्यकता है मैं उन क्रांतिकारी लोगो का साथ देने जा रही हूँ, हमें सभी छात्रों के अधिकारों की रक्षा करनी है, तुम भी चलो। उसने मना कर दिया। उसे डर था कि पिछली बार लाठी हाथ पर पड़ी थी अगली बार कहीं सिर ही शिकार न बन जाये। लेकिन उसके भीतर की क्रांति उसे कचोट रही थी। तो उसने भी बदलाव का कदम उठा ही लिया। उसने ठान लिया कि सबसे पहले वो खुद को बदलेगी। खुद को सशक्त बनाएगी और फिर उसी राह पर चलते हुए समाज को सशक्त बनाएगी। उसके अंदर की दुर्गा ने अपना त्रिशूल चुन लिया था कलम के रूप में और धीरे धीरे उसने अज्ञानता के महिषासुर को मारना शुरू कर दिया।
तीन साल यूँ ही निकल गए। उसने CAPF की परीक्षा दी और उसमें भी चयनित हो गयी। स्नातक के तीन साल बाद वह CRPF में असिस्टेन्ट कमांडेंट बन चुकी थी। उसकी मेहनत और BHU के आशीर्वाद ने उसे जो गर्व की अनुभूति दी वो शायद अतुलनीय थी। उसकी पहली पोस्टिंग कश्मीर में हुई थी जहाँ उसका सामना लंका के सिगरेट अड्डों में बसने वाले वाले रावणों से भी खूंखार राक्षसों से हर दिन होता था।
उसने बहुत दिनों बाद फेसबुक खोला। ट्रेनिंग के समय वह चला नही पाती थी और कॉलेज के समय में तो ढोंगियों और स्त्री स्वाधीनता की निंदा करने वाले लोगो की पोस्ट्स से त्रस्त हो कर उसने फेसबुक से नफरत करना शुरू कर दिया था।
खैर उसने एफबी देख ही लिया। कुछ न्यूज़ फीड स्क्रॉल करने पर उसने देखा कि उसके कॉलेज टाइम का एक बदमाश जो अपने समय मे लंका की फब्तियाँ मार्किट का बेताज बादशाह हुआ करता था उसे पुलिस घसीट कर ले जा रही है। उसके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा हुँह, इनका कुछ नही हो सकता। उसने नोटिफिकेशन चेक किया। उसकी बीएचयू वाली रूममेट, जो कि अब जेएनयू वाली हो चुकी थी, उसका जन्मदिन था। रात का ही समय था, उसने उसे फोन लगाया। कुछ देर की घंटी के बाद उसने फोन उठाया तो उसकी आवाज़ के साथ साथ कई लोगो के नारे लगाने की आवाज़ें आ रही थी। उसने कहा हैप्पी बर्थडे.... क्या???.... अरे हैप्पी बर्थडे!!! नहीं समझ मे आया?? हैप्पी बर्थडे बोल रही हूं!!! बर्थडे विश का जवाब तो नहीं आया लेकिन एक आवाज़ ज़रूर आयी कि "भारत तेरे टुकड़े होंगें, इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह" भारत की बर्बादी....... कश्मीर की आज़ादी.... उसने फोन रख दिया आंखें मूंदी और सो गई। उसने सुबह की खबर देखी कि जेएनयू के छात्रों को लाठियों की सलामी मिली। उसने वर्दी पहनी और छावनी ग्राउंड पर पहुच गयी। बटालियन के साथ उसने तिरंगे को सलामी दी और बस यही कहा, लव यू इंडिया....
©अशुतोष तिवारी