Wednesday, 21 August 2019

मध्यममार्ग- सबसे कठिन मार्ग

मैग्सेसे पुरस्कार की घोषणा के बाद रविश के द्वारा दिए गए धन्यवाद सम्बोधन में उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु को रखा। उन्होंने कहा कि यदि एक भी दर्शक खबरों और सूचनाओं के किनारे खड़े रह कर सही-ग़लत को पहचानने की इच्छा रखता है या पहचान करने की कोशिश भी करता है, तो इसका मतलब सुदृढ़ पत्रकारिता अभी सुरक्षित है।
आज के दौर में चाहे आप अख़बार पढ़ें, न्यूज़ चैनल देखें, पत्रिकाएँ पढ़ें या यूट्यूब देखें, आप यह स्पष्ट पाएँगे कि अतिवादिता अपने चरम पर है, एक इन्सान का मध्यममार्गी विचारधारा का होना बहुत ही जटिल हो चला है। आलम यह है कि किसी भी राजनैतिक बातचीत में यदि आप निष्पक्ष रहने का सोचें भी तो वादियों के सबसे ज्यादा हमले आप ही पर होंगे और उनके तर्कों से आपको पूर्णतः वैचारिक रूप से पंगु घोषित करने की कवायद की जाएगी।
आज कक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक चर्चा आयोजित की गई थी जिसकी मध्यस्थता के लिए मुझे संचालक बनाया गया था। व्याख्यानों के बाद जब प्रश्नोत्तरी की बारी आई तब आधा दर्जन हाथ एकसाथ प्रश्न पूछने के लिए खड़े हो गए जो कि एक संचालक के लिए धर्मसंकट की स्थिति होती है कि आख़िर किसे मौका दिया जाए।
कुछ यही स्थिति मध्यममार्गी विचारधारकों की होती है जब एक ही घटना पर दो या उससे अधिक विचार उसके समक्ष होते हैं। ऐसी स्थिति में उसे अपनी निष्पक्षता को भी अक्षुण्ण रखनी है और इसका ख़ासा ध्यान भी रखना होता है कि किसी भी विचार पर सहमति जताने पर उसे दायीं या बायीं ओर धकेल न दिया जाए।
हालाँकि देखा जाए तो यह एक आधारभूत मानवीय गुण है कि मानव जिसे सही मानता है, वह चाहता है कि उसके साथ का व्यक्ति भी उसी सही को माने अन्यथा उसका विरोधी घोषित हो जाए। याद कीजिए बचपन जहाँ आप अपने भाई-बहन से लड़ाई करते हों और आपकी माँ आपको लड़ाई के ज़िम्मेदार मान कर दो चपत लगा दे तो वह बाल मन  स्वतः ही घोषित कर देता है कि माँ हमेशा उसी का साथ देती है जबकि तब तक हमें विरोध या समर्थन का कोई पारिभाषिक बोध नहीं होता।
पत्रकारिता भी कुछ इन्हीं वैचारिक सिद्धान्तों पर आधारित होती है। कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि पत्रकारिता सरकार के लिए एक पूर्णकालिक विपक्ष है और इसी में उसकी निष्पक्षता निहित है। प्रथम दृष्टया यह वाक्य द्वंद्वात्मक लगेगा पर सच यही है कि पाठक या दर्शक को सही और गलत की पहचान करने की क्षमता पत्रकारिता तभी करा सकती है जब वह विषय का आलोचनात्मक अध्ययन पाठक/दर्शक को पेश करे बिना किसी व्यक्तिगत विचार के। यह पत्रकारों के व्यक्तिगत विचारों के कारण ही है कि हम बड़ी ही सहजता से देश के प्रमुख अखबारों के बारे में कह देते हैं कि यह अति-लेफ्टिस्ट अख़बार है या यह चाटुकार अख़बार है (यह सिद्धान्त चैनलों पर भी लागू है)।
ऐसे में पाठक/दर्शक का मध्यममार्गी होना अतिआवश्यक हो जाता है ताकि खबरों को तौलने का उसका गणित हमेशा सही रहे। हाँ मध्यममार्गी होने पर यदि कोई आप पर अवसरवादी होने का आरोप लगाए तो निश्चिंत रहना ही सही है क्योंकि आधुनिक काल (या कहें कॉरपोरेट काल) तुलनात्मक सत्य को ही सत्य मानता है।

©आशुतोष तिवारी

Monday, 5 August 2019

एक कदम स्वच्छता की ओर

रामबन आज हर एक निवाले के साथ रानी को देखता और कामतानाथ स्वामी को धन्यवाद देता कि उन्होंने घर में बेटी के रूप में देवी भेजी है। रानी के स्कूल में कल स्वच्छ भारत अभियान पर कविता पाठ होनी है, शाम से उसी तैयारी में लगी हुई है। "सुप्रभात मैं रानी वाल्मीकि आज आपके समक्ष एक कविता प्रस्तुत करने जा रही हूँ.....", इस वाक्य की पुनरावृत्तियाँ रामबन के रोम-रोम को प्रफ्फुलित कर रही थीं। रामबन ने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा था, पहली बार स्कूल के चौखट तभी आया था जब रानी का दाखिला कराना था। उसकी तो सारी शिक्षा दिल्ली की नालियों और गटरों के बीच हुई थी। उसके बाबूजी जी गाँव से दिल्ली आए थे और उन मज़दूरों में शुमार थे जो दिल्ली की तेज रफ्तार सड़कों के नीचे फैली नालियों की रफ्तार को बनाए रखने का ज़िम्मा उठाए हुए थे। क्योंकि रामबन की माँ मर चुकी थी तो किशोर रामबन भी बाबूजी के साथ दिल्ली रहने लगा था। इसी दौरान उसने अपने पिताजी के काम को देखा और उसे अपनी पैतृक ज़िम्मेदारी समझ कर सीख भी लिया। 13 साल की उम्र से ही रामबन राजधानी के गटरों में उतर कर अपनी साँस रोक कर सफाई करने में दक्ष हो गया ताकि दिलवालों का शहर दिल खोल कर साँस ले सके। जब वह 19 साल का हुआ तो उसके बाबूजी गटर साफ करते हुए चल बसे। पर रामबन ने यह काम जारी रखा। उसके साथी मज़दूर कहा करते थे कि उसके जितनी जल्दी सफाई कोई मज़दूर न कर सकता था। पर तारीफ़ से पेट थोड़ी भरता है, बात रोटी की थी इसीलिए उसके घर का चूल्हा गटर के रास्ते गर्म होता था।

"पापा बताओ न मैंने सही से कविता सुनाई है न?" रामबन को तो रानी जो सुनाती वही सही लगता, और वैसे भी किताबी मामले में गलती निकालने का हुनर उसे इस जन्म में कहाँ नसीब था? रानी यही अम्मा से पूछती तो वह "सब अच्छा है" कह कर उसे बार-बार सोने को कहती। लछमी वैसे भी लड़की जात को पढ़ाने में अधिक विश्वास नहीं रखती थी पर इधर बीच कुछ प्रतियोगिताओं में रानी को पुरस्कार में काँच के गिलास और कटोरी का सेट मिला था तब से लछमी के विचारों में कुछ लचीलापन आ गया था।
रानी जब सो गई तब रामबन ने लछमी से कहा कि सब तैयारी हो गई हैं गाँव के हमारे पट्टे का हिस्सा जो नई सड़क में फँसा है उसका मुआवज़ा अगले हफ्ते मिल जाएगा और गज्जू भैया की रिपेयरिंग की दुकान पर भी बात हो गयी है वहाँ काम मिल जाएगा। दम्पति ने अगली सुबह तक समान बाँध कर रात वाली ट्रेन से गाँव निकलना तय कर लिया। अचानक लछमी ने पूछा कि टिकट की पैसे हैं या नहीं। रामबन ने कहा कि कल एक गटर और साफ करना है और इस हफ्ते की मजूरी मिल जाएगी। सुनकर लछमी ने सुकून की साँस ली और दोनों सो गए। अगली सुबह रानी स्कूल जा चुकी थी और रामबन भी अपनी रोज़ी के आगे पहुँच चुका था। हालाँकि आज उसने गन्ध से लड़ने के लिए शराब नहीं पी क्योंकि आज ही उन्हें गाँव निकलना था। रामबन केवल एक जाँघिया पहने गटर में उतर गया। कुछ देर साफ करने के बाद अचानक गटर में शांति सी पसर गई। बाहर बीड़ी पी रहे कुछ मज़दूरों का ध्यान वहाँ गया और वे गटर में झाँकने लगे....
इधर रानी ने प्रतियोगिता में फिर प्रथम स्थान हासिल किया और उसे पुरस्कार में गाँधीजी की एक छोटी सी मूर्ति मिली। वह खुशी से दौड़ती हुई घर की ओर जाने लगी। वह घर पहुँची तो देखा कि लोगो की भीड़ लगी हुई है उसके कदम और तेज़ हो गए। भीड़ को काटते हुए वो अंदर पहुँची तो देखा कि मैले से लिपटे रामबन की लाश पड़ी है और लछमी वहीं बेसुध पड़ी है। रानी के कदम वहीं ठिठक गए और उसके हाथ से वह मूर्ति गिर कर फूट गई। बच्ची रो तो रही थी पर एक अजीब सा सन्नाटा था। बस बस्ती के पीछे लगे उस बड़े से पोस्टर के फरफराने की आवाज़ आ रही थी जिसमें गाँधी जी बने हुए थे और लिखा हुआ था, "एक कदम स्वच्छता की ओर।"

© आशुतोष तिवारी