मैग्सेसे पुरस्कार की घोषणा के बाद रविश के द्वारा दिए गए धन्यवाद सम्बोधन में उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु को रखा। उन्होंने कहा कि यदि एक भी दर्शक खबरों और सूचनाओं के किनारे खड़े रह कर सही-ग़लत को पहचानने की इच्छा रखता है या पहचान करने की कोशिश भी करता है, तो इसका मतलब सुदृढ़ पत्रकारिता अभी सुरक्षित है।
आज के दौर में चाहे आप अख़बार पढ़ें, न्यूज़ चैनल देखें, पत्रिकाएँ पढ़ें या यूट्यूब देखें, आप यह स्पष्ट पाएँगे कि अतिवादिता अपने चरम पर है, एक इन्सान का मध्यममार्गी विचारधारा का होना बहुत ही जटिल हो चला है। आलम यह है कि किसी भी राजनैतिक बातचीत में यदि आप निष्पक्ष रहने का सोचें भी तो वादियों के सबसे ज्यादा हमले आप ही पर होंगे और उनके तर्कों से आपको पूर्णतः वैचारिक रूप से पंगु घोषित करने की कवायद की जाएगी।
आज कक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक चर्चा आयोजित की गई थी जिसकी मध्यस्थता के लिए मुझे संचालक बनाया गया था। व्याख्यानों के बाद जब प्रश्नोत्तरी की बारी आई तब आधा दर्जन हाथ एकसाथ प्रश्न पूछने के लिए खड़े हो गए जो कि एक संचालक के लिए धर्मसंकट की स्थिति होती है कि आख़िर किसे मौका दिया जाए।
कुछ यही स्थिति मध्यममार्गी विचारधारकों की होती है जब एक ही घटना पर दो या उससे अधिक विचार उसके समक्ष होते हैं। ऐसी स्थिति में उसे अपनी निष्पक्षता को भी अक्षुण्ण रखनी है और इसका ख़ासा ध्यान भी रखना होता है कि किसी भी विचार पर सहमति जताने पर उसे दायीं या बायीं ओर धकेल न दिया जाए।
हालाँकि देखा जाए तो यह एक आधारभूत मानवीय गुण है कि मानव जिसे सही मानता है, वह चाहता है कि उसके साथ का व्यक्ति भी उसी सही को माने अन्यथा उसका विरोधी घोषित हो जाए। याद कीजिए बचपन जहाँ आप अपने भाई-बहन से लड़ाई करते हों और आपकी माँ आपको लड़ाई के ज़िम्मेदार मान कर दो चपत लगा दे तो वह बाल मन स्वतः ही घोषित कर देता है कि माँ हमेशा उसी का साथ देती है जबकि तब तक हमें विरोध या समर्थन का कोई पारिभाषिक बोध नहीं होता।
पत्रकारिता भी कुछ इन्हीं वैचारिक सिद्धान्तों पर आधारित होती है। कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि पत्रकारिता सरकार के लिए एक पूर्णकालिक विपक्ष है और इसी में उसकी निष्पक्षता निहित है। प्रथम दृष्टया यह वाक्य द्वंद्वात्मक लगेगा पर सच यही है कि पाठक या दर्शक को सही और गलत की पहचान करने की क्षमता पत्रकारिता तभी करा सकती है जब वह विषय का आलोचनात्मक अध्ययन पाठक/दर्शक को पेश करे बिना किसी व्यक्तिगत विचार के। यह पत्रकारों के व्यक्तिगत विचारों के कारण ही है कि हम बड़ी ही सहजता से देश के प्रमुख अखबारों के बारे में कह देते हैं कि यह अति-लेफ्टिस्ट अख़बार है या यह चाटुकार अख़बार है (यह सिद्धान्त चैनलों पर भी लागू है)।
ऐसे में पाठक/दर्शक का मध्यममार्गी होना अतिआवश्यक हो जाता है ताकि खबरों को तौलने का उसका गणित हमेशा सही रहे। हाँ मध्यममार्गी होने पर यदि कोई आप पर अवसरवादी होने का आरोप लगाए तो निश्चिंत रहना ही सही है क्योंकि आधुनिक काल (या कहें कॉरपोरेट काल) तुलनात्मक सत्य को ही सत्य मानता है।
©आशुतोष तिवारी
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