Monday, 5 August 2019

एक कदम स्वच्छता की ओर

रामबन आज हर एक निवाले के साथ रानी को देखता और कामतानाथ स्वामी को धन्यवाद देता कि उन्होंने घर में बेटी के रूप में देवी भेजी है। रानी के स्कूल में कल स्वच्छ भारत अभियान पर कविता पाठ होनी है, शाम से उसी तैयारी में लगी हुई है। "सुप्रभात मैं रानी वाल्मीकि आज आपके समक्ष एक कविता प्रस्तुत करने जा रही हूँ.....", इस वाक्य की पुनरावृत्तियाँ रामबन के रोम-रोम को प्रफ्फुलित कर रही थीं। रामबन ने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा था, पहली बार स्कूल के चौखट तभी आया था जब रानी का दाखिला कराना था। उसकी तो सारी शिक्षा दिल्ली की नालियों और गटरों के बीच हुई थी। उसके बाबूजी जी गाँव से दिल्ली आए थे और उन मज़दूरों में शुमार थे जो दिल्ली की तेज रफ्तार सड़कों के नीचे फैली नालियों की रफ्तार को बनाए रखने का ज़िम्मा उठाए हुए थे। क्योंकि रामबन की माँ मर चुकी थी तो किशोर रामबन भी बाबूजी के साथ दिल्ली रहने लगा था। इसी दौरान उसने अपने पिताजी के काम को देखा और उसे अपनी पैतृक ज़िम्मेदारी समझ कर सीख भी लिया। 13 साल की उम्र से ही रामबन राजधानी के गटरों में उतर कर अपनी साँस रोक कर सफाई करने में दक्ष हो गया ताकि दिलवालों का शहर दिल खोल कर साँस ले सके। जब वह 19 साल का हुआ तो उसके बाबूजी गटर साफ करते हुए चल बसे। पर रामबन ने यह काम जारी रखा। उसके साथी मज़दूर कहा करते थे कि उसके जितनी जल्दी सफाई कोई मज़दूर न कर सकता था। पर तारीफ़ से पेट थोड़ी भरता है, बात रोटी की थी इसीलिए उसके घर का चूल्हा गटर के रास्ते गर्म होता था।

"पापा बताओ न मैंने सही से कविता सुनाई है न?" रामबन को तो रानी जो सुनाती वही सही लगता, और वैसे भी किताबी मामले में गलती निकालने का हुनर उसे इस जन्म में कहाँ नसीब था? रानी यही अम्मा से पूछती तो वह "सब अच्छा है" कह कर उसे बार-बार सोने को कहती। लछमी वैसे भी लड़की जात को पढ़ाने में अधिक विश्वास नहीं रखती थी पर इधर बीच कुछ प्रतियोगिताओं में रानी को पुरस्कार में काँच के गिलास और कटोरी का सेट मिला था तब से लछमी के विचारों में कुछ लचीलापन आ गया था।
रानी जब सो गई तब रामबन ने लछमी से कहा कि सब तैयारी हो गई हैं गाँव के हमारे पट्टे का हिस्सा जो नई सड़क में फँसा है उसका मुआवज़ा अगले हफ्ते मिल जाएगा और गज्जू भैया की रिपेयरिंग की दुकान पर भी बात हो गयी है वहाँ काम मिल जाएगा। दम्पति ने अगली सुबह तक समान बाँध कर रात वाली ट्रेन से गाँव निकलना तय कर लिया। अचानक लछमी ने पूछा कि टिकट की पैसे हैं या नहीं। रामबन ने कहा कि कल एक गटर और साफ करना है और इस हफ्ते की मजूरी मिल जाएगी। सुनकर लछमी ने सुकून की साँस ली और दोनों सो गए। अगली सुबह रानी स्कूल जा चुकी थी और रामबन भी अपनी रोज़ी के आगे पहुँच चुका था। हालाँकि आज उसने गन्ध से लड़ने के लिए शराब नहीं पी क्योंकि आज ही उन्हें गाँव निकलना था। रामबन केवल एक जाँघिया पहने गटर में उतर गया। कुछ देर साफ करने के बाद अचानक गटर में शांति सी पसर गई। बाहर बीड़ी पी रहे कुछ मज़दूरों का ध्यान वहाँ गया और वे गटर में झाँकने लगे....
इधर रानी ने प्रतियोगिता में फिर प्रथम स्थान हासिल किया और उसे पुरस्कार में गाँधीजी की एक छोटी सी मूर्ति मिली। वह खुशी से दौड़ती हुई घर की ओर जाने लगी। वह घर पहुँची तो देखा कि लोगो की भीड़ लगी हुई है उसके कदम और तेज़ हो गए। भीड़ को काटते हुए वो अंदर पहुँची तो देखा कि मैले से लिपटे रामबन की लाश पड़ी है और लछमी वहीं बेसुध पड़ी है। रानी के कदम वहीं ठिठक गए और उसके हाथ से वह मूर्ति गिर कर फूट गई। बच्ची रो तो रही थी पर एक अजीब सा सन्नाटा था। बस बस्ती के पीछे लगे उस बड़े से पोस्टर के फरफराने की आवाज़ आ रही थी जिसमें गाँधी जी बने हुए थे और लिखा हुआ था, "एक कदम स्वच्छता की ओर।"

© आशुतोष तिवारी

6 comments:

  1. झकझोर देने वाली मार्मिक कहानी,समाज के इस तबके की दशा विचार करने योग्य है।

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  2. मर्म को भेद देने वाली एक शानदार कहानी।

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  3. हृदयस्पर्शी कहानी

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  4. नमन करता हु इस छोटी सी कहानी की जिसने और जिसे लिखने वाले ने दोनो ने ही हृदय को स्पर्श कर लिया।

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  5. बहुत कुछ सीखना बाकी है आपसे आशुतोष बहुत ही ज्यादा ज्वलंत और मार्मिक है।आपकी बुद्धि को भगवान यू ही आगे बढ़ाए

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