किसी भी राष्ट्र, समाज अथवा संस्कृति की उन्नति इस पर निर्भर करती है कि वे कितने समावेशी हैं। यही सिद्धांत भाषा पर भी लागू होता है। हिंदी, एक समावेशी भाषा होने का उत्कृष्ट उदाहरण है। देखा जाए तो स्वाधीनता के सौ वर्ष पहले तक हिंदी का कोई ठोस अस्तित्व नहीं था लेकिन यह हिंदी के समावेशी और बहुवचनीय गुण ही थे जिस कारण आज यह विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा बन चुकी है। मध्यकालीन इतिहास के स्रोतों में सिंधु नदी के पूर्वी और जितनी भाषाएँ बोली गयी हैं उन्हें "हिन्दवी" (जिसमें आधुनिक हिंदी की जड़ें खोजी जाती हैं) कहा गया है। लेकिन उन सारी भाषाओं को एक सूत्र में पिरो कर समन्वय के साथ एक ऐसी भाषा का निर्माण किया गया जिसने उत्तर और मध्य भारत मे राष्ट्र चेतना की आधारशिला स्थापित की, जिस पर खड़े हो कर भारत के स्वतन्त्रता संग्राम और लोकतंत्र ने मज़बूती पाई। और यह उसी लोकतंत्र की सुंदरता है कि लगभग आधे राष्ट्र द्वारा बोले जाने के बावजूद इसे राष्ट्रभाषा नहीं बनाया गया क्योंकि हिंदी और हिंदुस्तानी के लिए देश में बोले जाने वाली हर भाषा राष्ट्रभाषा के समान है। आज हिंदी का स्वरूप बदल रहा है क्योंकि यह समय की माँग है। आधुनिकता, भूमण्डलीकरण और व्यवसायीकरण ने हिंदी को नए आयाम प्रदान किये हैं। कम्प्यूटर, इंटरनेट और सरकारी सेवाओं में हिंदी के प्रयोग ने हमारा जीवन सहज बनाने में बहुत मदद की है। यह सत्य है कि आज हिंदी में अंग्रेज़ी शब्दों और तरीकों का चलन बढ़ गया है पर हिंदी ऐसे ही कई भाषाओं का समाहार है और बिना किसी विवाद के सभी भाषाओं को गले लगाने की हिंदी की यह विशेषता शाश्वत बनी रहेगी।
©आशुतोष तिवारी
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