Friday, 25 October 2019

कार्तिक की हवा

कार्तिक के महीने में खेत की मेड़ पर बैठ कर धान की फसल में हवा से होने वाली सरसराहट को यदि आपने सुना है तो यकीन मानिए कि दुनिया की सबसे खूबसूरत आवाज़ों में से एक का रस आप ले चुके हैं। कार्तिक की हवा जादुई है। आँखे बंद कर उस सरसराहट को सुनना और उस ठंडी सी हवा का कान के पीछे से गुज़रना और इनसे देह में एक सिहर सी उठ जाना, इस हवा के खूबसूरत मिजाज़ का नमूना है। क्वांर की धूप और तपन के बाद यह शीतल हवा त्योहारों की दस्तक देती है। एक मायने में कहें तो कार्तिक की हवा समाजशास्त्र के एक खण्ड के समानांतर है जिसमें सामाजिक बदलाव की व्याख्या की गई है। यह हवा भी बदलाव ही ले कर आती है। इस हवा की आहट होते ही लोगों में स्वतः ऐसी ऊर्जा आ जाती है कि साल भर से धूल और मौसम की मार झेल रहे अपने घरों की सफाई-रँगाई में जुट जाते हैं। कबाड़ फेंक देते हैं, घर व्यवस्थित कर देते हैं। पुरानी बेलें छांट दी जाती हैं, सब्जियों की नई पौध बो दी जाती है। पुरानी रजाईयां सुखाई जाती हैं, रुई धुनी जाती है। कुल मिला कर यह हवा एक ऐसी प्रेरक शक्ति है जो लोगों को कर्तव्यबोध कराती है कि, समय बदलाव माँग रहा है, उठो और काम पर लग जाओ। कचरा फेंको कि अब सजाने के समय आ चुका है।
पर कार्तिक की इस हवा से कुछ लोग डरते भी हैं। गाँव के बुजर्गों को इस हवा से नफरत है। यह इसलिए क्योंकि एक तो वे यह मानने के लिए तैयार नहीं होते की अब मौसम बदल चुका है लेकिन इस हवा की ठंडक उनकी हड्डियों को ठिठुराने लगती है, उन्हीं हड्डियों को, जिनकी ताकत तो चली गयी है लेकिन अकड़ नहीं। उन्हें डर होता है कि कम्बख़्त यह हवा, यह ठंड फिर आ गई पता नहीं अबकी बार इस ठंड टिकेंगे या नहीं। कमोबेश समाजशास्त्र भी कुछ ऐसा ही कहता है। परिवर्तन की हवा चलती है, कर्मठ लोगों में जोश लाती है, लोग पुरानी सोच को फेंक देते हैं, नई व्यवस्था का स्वागत होता है, बदलाव के कदम उठते हैं, जमी हुई व्यवस्था अस्तित्व खो देने के डर से प्रतिरोध करती है, बदलाव के इस मौसम से खुद को छुपाती है, हवा ज़्यादा तेज हुई तो पुरानी व्यवस्था के फेफड़ों तक हवा जानी बंद हो जती है।
बदलाव ज़रूरी है ताकि हमारी जीवंतता बनी रहे। कार्तिक की हवा नितांत आवश्यक है ताकि परिवर्तन की आवश्यकता का बोध होता रहे। पर ज़माना तो ग्लोबल वार्मिंग का ठहरा। ऐसा हो सकता है कि मेड़ पर आँखें बंद कर आप धान की सरसराहट सुनने बैठे हों और सिवा गाड़ियों की चिल्ल-पों के कुछ सुनाई न दे और आँखें खोलने पर सामने पकी फसल पर ओले पड़ते हुए दिखें। होगा यह, कि बदलाव को भी पाला लग जाएगा और बुज़ुर्गों की तरह ठिठुरने के अलावा और कोई चारा न रहेगा।

- आशुतोष तिवारी

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